Wednesday, July 12, 2017

अति उत्साह में बेड़ा गर्क़

- वीर विनोद छाबड़ा 
बिजली विभाग का एक मामला फंसा था माननीय हाई कोर्ट में। मुद्दा बहुत गंभीर था। विभागीय वकील के साथ शहर का एक नामी वक़ील भी इंगेज किया   गया। एक दिन हमारे वकील ने सचेत किया कि आपके ऑफिस के स्तर से ठीक से पैरवी नहीं हो रही है। केस हारने की प्रबल संभावना है।
बॉस साहब ने फ़ौरन चार सबसे बढ़िया ऑफिसर्स की टीम बनाई। इसका मुखिया कानून विशेषज्ञ को बनाया। हुक्म दिया कि इलाहाबाद जाइए। जो भी ज़रूरी हो करिये। स्टे वकेट होना ही चाहिए।
टीम इलाहाबाद पहुंची। वकील साहब को कई नए तथ्य मय साक्ष्य उपलब्ध कराये। सबने दिन रात एक कर दिया। नया हलफ़नामा दाख़िल हुआ और आख़िरकार फैसला विभाग के पक्ष में ही गया। स्टे वकेट हो गया। टीम का जाना सार्थक हुआ।
अगले दिन सुबह त्रिवेणी एक्सप्रेस से सब लखनऊ पहुंचे। टीम हेड ने कहा - सब घर जाइये और नहा-धोकर और स्नान आदि करके बारह बजे ऑफिस में हाज़िर हों। सब मिल कर बतायेंगे चेयरमैन साहब को इस उपलब्धि के बारे में। बॉस  खुश होंगे। सबको खूब शाबाशी मिलेगी। टीम वर्क ज़िंदाबाद।
सभा विसर्जित हुई। सब अपने घरों की तरफ़ रवाना हो गए।
ऑफिस में पूरी टीम बॉस के सामने हाज़िर हुई। वहां एक और टीम बैठी हुई थी। और इससे पहले कि उपलब्धि के बारे में उन्हें बताने के लिए उत्साहित टीम लीडर मुंह खोलते, बॉस ने कहा - मुझे सब मालूम है। आप जायें। एक और ज़रूरी केस निपटाना है। और फिर चीफ़ मिनिस्टर साहब से मीटिंग है।

सब कितना उत्साहित होकर गए थे। अब हमारे चेहरे लटके हुए थे। कौन है इसके पीछे? सब की मेहनत पर पानी कौन फेर गया? हम सब हैरान कि यह सब कैसे हुआ?
जासूसी की गई तो पता चला कि हमारी ही टीम का एक साथी अति उत्साहित हो गया था। हुआ योन कि वो स्टेशन से उतर कर अपने घर जाने की बजाये सीधा बॉस के घर पहुंच गया। उसने सारे वृतांत का और प्राप्त उपलब्धि का बखान बॉस कुछ इस तरह से किया कि अगर वो न होता तो इस केस का फ़ैसला विभाग के पक्ष में हरग़िज़ न हुआ होता। बाकी सब तो बाज़ार में मटरगश्ती और शॉपिंग करते रहे और होटल में पड़े पड़े ऐश उड़ाते रहे।
हम सबने उस साथी को खूब भला-बुरा कहा। लेकिन बहरहाल यह तो अच्छा हुआ कि बॉस ने इलाहाबाद फ़ोन करके वक़ील को धन्यवाद दिया तो पोल खुल गयी।
बॉस ने हम सबको बुलाया। सॉरी कहा। टीम को शाबाशी दी। लेकिन ख़राब  बात यह हुई कि हमारे उस अति उत्साहित जीव का दूसरे छोटे शहर ट्रांसफर हो गया। दिल से बहुत सज्जन आदमी थे वो। उनकी पत्नी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। उस छोटे शहर में चिकित्सा का आधुनिक इलाज़ संभव नहीं था। हम सबको बहुत खराब लगा। बॉस से हमने विनती की। और बॉस मान गए।
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नोट- अति उत्साह में कुछ लोग अकेले श्रेय हड़पने चक्कर में अपना ही बेड़ा गर्क़ करा बैठते हैं।
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12 July 2017
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D-2290 Indira Nagar
Lucknow - 226016
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mob 7505663626

2 comments:

  1. प्रेरक प्रस्तुति
    सच है अति उत्साह का परिणाम अच्छा नहीं होता

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  2. bahut badhiya vyangya. hamare bolg par aapka swaghat hai.-
    https://lokrang-india.blogspot.in/

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