Tuesday, July 25, 2017

मन से आज़ादी

- वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले की बात है। हमारे पेट में बहुत दर्द उठा। डॉक्टर से मिले। वो सिगरेट फूंक रहे थे। हमें देख कर सिगरेट बुझा दी। हमें सर से पांव तक देखा। कायदे से परीक्षण किया। दवा लिख दी और साथ में एडवाइस किया - बरखुरदार, सिगरेट पीना बंद कर दो। यह कह कर उन्होंने बुझी सिगरेट दोबारा सुलगा ली।
हमारे पिताजी कैंसर से पीड़ित थे और एसजीपीजीआई में भर्ती थे। हम यूरोलॉजी के एक प्रोफ़ेसर से मिलने उनके चैंबर में गए। वो सिगरेट के लंबे लंबे कश खींच रहे थे। बोले - अपने पिताजी से कहना कि सिगरेट छोड़ दें।
यूं हम जिस विभाग में कार्यरत थे, वहां पांच प्रोजेक्ट हॉस्पिटल थे। उनमें तैनात डॉक्टर्स का इस्टैब्लिशमेंट कुछ समय हमने देखा। इस नाते डॉक्टरों के संपर्क में अक्सर रहना पड़ा। कई डॉक्टर धुआंधार सिगरेट पीते दिखे जो दूसरों को सिगरेट न पीने की सलाह दिया करते थे। हमने एक डॉक्टर साहब से कहा - दूसरों को एडवाइस करते हैं, लेकिन खुद अमल नहीं करते। क्या प्रभाव पड़ता होगा मरीज़ों पर?

चाय में दोस्ती की मिठास

वीर विनोद छाबड़ा
यूं तो हमें दिलो जान से चाहने वालों की कमी नहीं है। लेकिन एक हैं रवि प्रकाश मिश्रा मेरे पक्के भाजपाई दोस्त। लेकिन दोस्ती पहले और पॉलिटिक्स बाद में। मुझसे महीने भर ही बड़े होंगे। कहीं खाया-पीया और पेमेंट का नंबर आया तो इन्होंने मुझे कभी जेब में हाथ नहीं डालने दिया।
सत्तर के दशक का शुरुआती दौर था। हमने इनकी हवेली (मिश्रा भवन) में बहुत चाय पी है। पटियाला साइज़ के शीशे वाले गिलास में।
चाय वाकई बहुत बढ़िया होती थी। दो वजहों से।
एक तो प्यार की मिठास। और दूजे चीनी की मिठास। गिलास के पैंदे में इतनी ज्यादा चीनी जमा रहती थी कि चम्मच खड़ा हो जाए। यह समझिए की चाश्नी घुली चाय पी रहें हैं।
बीच बीच में मिश्रा जी पूछते भी रहते थे - चाय ठीक लग रही है न?
हम लोग सिर्फ़ हां ही बोलते थे। बहुत बढ़िया कहने की गलती नहीं करते थे। जब कभी गलती हुई तो समझिए कि फिर एक पटियाला गिलास में ऊपर तक भरी चायचाश्नी वाली चाय हाज़िर।

Monday, July 24, 2017

प्रमोशन और प्रोटोकॉल

- वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले की बात है। मैं नया-नया अफ़सर के पद पर प्रमोट हुआ था। हमारे ख़ानदान हम पहले थे.जो क्लास वन अफसर के लेवल पर पहुंचे थे। इससे पहले क्लास टू आधा दर्जन धक्के खाते रहे हैं।
वो कहते हैं कि ख़ुदा जब हुस्न देता है, नज़ाकत आ ही जाती है। कुछ ऐसा ही हाल अपना भी हुआ। क्लास वन अफ़सर बहुत बड़ी तोप होती है।
पद की गरिमा को मेन्टेन करने के लिए कई तरह के प्रोटोकॉल अपनाने पड़े। जैसे नमस्ते का जवाब बोल कर या हंस कर नहीं देना चाहिए। बल्कि हौले से सर हिला कर अनदेखी कर आगे बढ़ लेना चाहिए। कोशिश करिये कि बहुत जल्दी में हैं। ज़रूरी ओप्रशन करने जा रहे हैं। और अगर नमस्ते करने वाली भद्र महिला हो तो बा-अदब हलकी मुस्कान ही छोड़नी है।
अगर अंदर से आप बहुत मजबूत हैं तो खड़े होकर बात करना चाहिए। चाय का ऑफर दीजिये। जेब से चॉकलेट या टॉफ़ी ज़रूर रखें। मुट्ठी खोल दें। जितनी आपकी श्रद्धा हो उस हिसाब से न्यौछावर कर दें। भले ही वो मन ही मन आपको 'गीले साहेब' टाईप दर्जन भर की पदवियों से विभूषित कर दे।   
सड़क किनारे ढाबे पर खड़े होकर चाय नहीं पीनी है। खुद इमेज ख़राब होती है। कोई कह भी सकता है। बाबू की आदत से दूर हो। वरना यह कहने वालों की कमी नहीं है - साले, अब तो बाबू की योनि से बाहर आ जाओ। आदमी बनो।
बॉस के कमरे में जाएं तो शर्ट के बटन ऊपर तक बंद कर ले और आस्तीन पूरी नीचे हाथ तक ले जाओ। वगैरह, वगैरह। पान या मसाला खाते हैं तो अच्छी तरह  कुल्ला कर लो। वो पत्नी ने बात दीगर है कि यह सब ज्यादा देर तक नहीं चला। ज्यादातर प्रोटोकॉल रिलैक्स कर दिए। दरअसल दोस्तों और हमदर्दों की संख्या कम होने लगी थी।
घर में तो पहले ही दिन से प्रोटोकॉल की ऐसी कम तैसी दी। काहे के अफसर। पगार तो बढ़ी कहीं नहीं। बतावें हैं कि एक ठो इंक्रीमेंट लग गया है। पत्नी  के लिए में इंक्रीमेंट मिली रक़म की कोई अहमियत नहीं। हमारे खानदान में पत्नी से बड़ा अफसर कोई नहीं हुआ है और अगले जन्मों तक यही व्यवस्था रहनी है। तो मैं भला इस परंपरा को कैसे बनाये रखने की ज़ुर्रत करता।
सारी दिनचर्याऐं  पूर्वरत रहीं। उसी क्रम में एक दिन मैं सुबह-सुबह चूहेदानी में फंसा चूहा दूर एक नाले में छोड़ने जा रहा था।

Saturday, July 22, 2017

अभी हम सब बाक़ायदा ज़िंदा हैं


-वीर विनोद छाबड़ा
हर साल का ०४ अक्टूबर मेरे लिए महत्व का दिन होता है।
नहीं, नहीं। न मेरा जन्मदिन है और न पत्नी का। न बच्चों का। न विवाह का दिन है। न माता-पिता या भाई-बहन का जन्मदिन। न ही साली-साडू या साल साले की पत्नी  का जन्मदिन। प्रेमिका कोई थी नहीं। एक जो थी भी तो वो एकतरफा थी। न वो कुछ बोली और न कुछ हम बोले। एक दिन दिल कड़ा किया कि आज मन की बात कर लूंगा। लेकिन वो उस दिन यूनिवर्सिटी नहीं आई। हफ्ते भर बाद दिखी। दिल को धक्का लगा। मांग भरो सजना!
दरअसल १९७१ को आज ही का दिन था। लखनऊ यूनिवर्सिटी में मेरा पहला कदम। उस साल ज़बरदस्त बाढ़ के कारण सेशन देर से शुरू हुआ। यूनिवर्सिटी में भी पानी घुस गया था। पॉलिटिक्स में पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल करने के लिए दाखिला लिया था।
जहां तक मुझे याद है आज ही के दिन मेरी रवि मिश्रा, प्रमोद जोशी, उदय वीर श्रीवास्तव और विजय वीर सहाय से भेंट हुई थी। पढाई पूरी करने के बाद प्रमोद जोशी और विजय वीर पत्रकारिता में चले गये। आज भी वहीं हैं। मैं, रवि और उदय अब पॉवर सेक्टर से रिटायर्ड हैं। विजय भारत मिश्र कुछ समय बाद मिले। वो अमीनाबाद इंटर कॉलेज में वाईस प्रिसिपल से रिटायर हुए।
सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव मुझसे एक क्लास आगे थे। हरीश रावत,पूर्व मुख्य मंत्री उत्तरांचल भी सीनियर थे।
अच्छी बात यह है कि हम सब ज़िंदा हैं और फेस बुक पर हैं। 
यूनिवर्सिटी में पढ़ने का अलग ही आनंद है। को-एजुकेशन भी एक बड़ा फैक्टर होता है। बहुत से लड़के-लड़कियां अलग-अलग शहरों से आते हैं पढ़ने। कोई अमीर और कोई ग़रीब। सबके अपने अपने सपने।
कोई नाना प्रकार के वस्त्रों में सुसज्जित। और कुछ मस्ती के लिए आते हैं। उछल-फांद यही जीवन है इनके लिये। बाप-दादाओं की कमाई इतनी ज्यादा है कि सात पुश्तें उस पर पल जायें।
और कुछ वास्तव में पढ़ने के लिए। कुछ बनने। दीन-दुनिया से बिलकुल बेख़बर। परीक्षा नज़दीक आते ही ज्यादातर को कैरियर की फ़िक्र लग जाती है।  माहौल बहुत प्रतिस्पर्धा वाला बन जाता है। कोई किसी को एक शब्द भी बताने से कतराता है।  
मैंने यहां पोलिटिकल साइंस में एम.ए. किया और फिर एम.ए. स्पेशल।  इरादा था पत्रकार बनने का। लेकिन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में नौकरी लग गयी। फिर भी पढ़ता रहा। सुबह की क्लासेज अटेंड करते हुए सोशियोलॉजी में एम.ए. कर डाला। एलएलबी में एडमिशन हो गया था। फीस देने के लिए कैशियर ऑफिस गया। पैसों के साथ विंडो में हाथ डाला। लेकिन अगले क्षण खींच लिया। बस और नहीं, बस और नहीं। भाग खड़ा हुआ। जम के नौकरी भी तो करनी थी।
मित्रों आपको याद है यूनिवर्सिटी या कॉलेज या स्कूल का पहला दिन? उस दिन की याद को शेयर करें।
नोट - उन दिनों की एक तस्वीर। इसमें हम वो पांचों दोस्त हैं जो ०४ अक्टूबर १९७१ को मिले थे। सबसे ऊपर बायें मैं, मेरे बाद विजय वीर सहाय दूसरी पंक्ति में बाएं से दूसरे उदय वीर, दायें से दूसरे प्रमोद जोशी और पहली पंक्ति में सबस दायें बैठे हैं रवि मिश्रा।
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२३ जुलाई २०१७ 
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D-2290 Indira Nagar
Lucknow - 226016
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mob 7505663626


























अंग्रेज़ी में हाथ तंग

-वीर विनोद छाबड़ा 
अंग्रेज़ी में हाथ तंग होना कोई शर्म की बात नहीं है। हम खुद इसके मरीज़ रहे हैं। अंग्रेज़ी अख़बारों और फ़िल्मी रिसालों को पढ़ कर हमने अंग्रेज़ी सीखी। बाकी कसर बड़े बुज़ुर्गों ने ठीक कर दी। नौकरी के शुरुआती १५ साल तो अंग्रेज़ी में ही काम करना पड़ा। यों सरकारी कार्यालयों में माशाअल्लाह अंग्रेज़ी से भी काम चल जाता है।
कहने का मक़सद यह कि हम अंग्रेज़ी के फन्ने खां कतई नहीं हैं। इसलिये पौने दो साल पहले जब हमारा फेस बुक पर आने का आईडिया बना तो दिल बैठ गया। यहां तो सब अंग्रेज़ी वाले लाटसाहब और राय बहादुर होंगे। हमारी बिसात तो लाइक और शेयर से आगे शायद ही बढ़ पाये। मगर इस आभासी दुनिया में कदम रखते ही जब हमने हिंदी वालों का जलवा और वर्चस्व देखा तो दिल बल्लियां उछलने को हो गया।
पहले अंग्रेज़ी से हिंदी के लिए भार्गव साहब की डिक्शनरी होती थी। अब तो गूगल ही सेकंडों में बता देता है सही क्या और गलत क्या। ठीक-ठाक स्पेलिंग भी गूगल बता देता है।
अब मैं आपको उस ज़माने की बात बताता हूं जब अंग्रेज़ी में हाथ तंग होने के बावजूद लोग चूं तक नहीं करते थे। प्रशंसा समझ स्वीकार कर लेते थे और जब असल मतलब समझ आता था तो ज़ाहिर है हंगामा तो होना ही था।
एक भद्र महिला जब ज्यादा सर खाती थी तो हमें मजबूरन क्षोभ के साथ कई बार कहना पड़ा  - प्लीज, गेट लॉस।
लेकिन उन पर कोई असर नहीं होता था। वो मुस्कुरा देतीं। हमीं उठ कर चल देते।
एक दिन वो उन्होंने हम पर चारों और से हमला बोल दिया। बहुत बिगड़ीं। दरअसल उन्हें किसी ने 'गेट लॉस' अर्थ बता दिया था - निकल जाओ यहां से। कुछ दिन बाद वो रैपीडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स की किताब पढ़ कर इतनी अच्छी अंग्रेज़ी तो सीख ही गईं कि कोई उन्हें मूर्ख न बना सके।

आग लगी हमरी झोंपड़िया में हम गावें मल्हार!


-वीर विनोद छाबड़ा
वो भी क्या सुखद दिन थे! साठ के दशक की शुरुआत। लखनऊ के आलमबाग का चौराहा। वहीं होता था चार टांगों पर खड़ा एक विशाल ट्रांसफार्मर। 
याद पड़ता है पूरे चंदर नगर और आस-पास के कई मोहल्लों को यहीं से थी बिजली की सप्लाई। मार्टिन एंड बर्न के ज़िम्मे था लखनऊ में बिजली सप्लाई। ऐशबाग़ और तालकटोरा दो तापीय पावर हाउस थे। बिल जमा करने रेसीडेंसी तक दौड़ लगती। टाइम पर बिल जमा नहीं हुआ तो अगले दिन बिजली कट।
कभी-कभार ही जाती थी बिजली। ट्रांसफर भी कभी-कभी दगते, ज़बरदस्त ब्लास्ट के साथ। चौबीस से छत्तीस घंटे लगते थे इसे बदलने में। गर्मी के दिनों में तो जान निकल जाती। लेकिन जनता भी थी कमाल के सबर वाली। चूं तक न करती। हाथ से झलने वाले तरह-तरह के पंखे। और फिर जनता इतनी सुविधा-परस्त भी नहीं थी। दिन किसी तरह कट जाता और रात के लिए तो वैसे भी खुली छत। ठंडी-ठंडी हवा। दरी बिछाई और सो गए। 
बहरहाल ट्रांसफार्मर का दगना बहुत बड़ा इवेंट होता। तमाम बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक जमा हो जाते। टकटकी लगाये फूंके ट्रांसफार्मर को रस्सियों के सहारे उतारते और फिर दूसरे-तीसरे दिन नया या उसी को मरम्मत होकर चढ़ाते देखना। यह जटिल और कौतुहलपूर्ण प्रक्रिया होती। और जैसे ही बत्ती आती एक साथ कई मोहल्लों से ख़ुशी का शोर उठता। आस-पास खड़े लोग खूब जोर-जोर से तालियां बजाते। बिजली कर्मियों को लोग शुक्रिया कहते। ऐसे ही आत्मिक सुख का अहसास टूटे तार को जोड़ते हुए देखने पर भी होता।
बचपन से लेकर जवानी तक फूंके ट्रांसफॉर्मरों की तलाश और उन्हें उतरते-चढ़ते देखने का शौक जारी रहा।
बड़े हुए। संयोग से नौकरी बिजली विभाग में मिली। बड़े-बड़े ट्रांसफार्मर और विशालकाय पावर हाउस देखे। लेकिन जले ट्रांसफार्मर की जगह नया लगते देखने की चाह नहीं चूकी।
अस्सी के दशक में इंदिरा नगर आये तब पता चली बिजली की अहमियत और दिक्कत । कभी तार का टूटना तो कभी टीपीओ उड़ जाना। कभी बस-बार तो लीड जल जाती। ट्रांसफर तो अक्सर उड़ा करते। डिमांड ज्यादा सप्लाई कम। ट्रांसफार्मर और तारें लोड न ले पातीं। ऊपर से आंधी तूफ़ान जैसी दैवीय आपदाएं।

Friday, July 21, 2017

आनंद रोमानी - सड़क पर वापसी

-वीर विनोद छाबड़ा
तकरीबन 20 साल पहले मैंने अपने मरहूम पिता जी- राम लाल, उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार- की पहली बरसी पर एक लंबा-चौड़ा लेख लिखा -अब यहां कोई नहीं आता।
मेरे दोस्त आनंद रोमानी ने इस पर एक ख़त लिखा। इसे हर्फ़-ब-हर्फ़ मैं पेश कर रहा हूं -

हैलो, विनोद!
इसमत ने अपने भाई अज़ीम बेग चुग़ताई की वफ़ात के बाद उन पर एक लेख प्रकाशित कराया था, जिसका शीर्षक उन्होंने रखा था - दोज़ख़ी। अज़ीम बेग अपने आख़िरी दिनों में एक लंबी मुद्दत तक चलने फिरने से लाचार रहे थे। वह बिस्तर पर ही पड़े रहते थे। और वहीं लटे लेटे ही उन्हों ने वह कहानियाँ लिखीं थीं, जिन्हें उस दौर की सबसे अच्छी हँसाने वाली कहानियाँ तसलीम किया गया था।
घरवाले उनकी दिन रात की निरंतर तीमारदारी करने से उनकी तरफ़ से बेज़ार न हो जाएं, इसका भी उन्हों ने एक उपाय ढूँढ लिया था। वह घरभर के सभी सदस्यों को एक दूसरे के ख़िलाफ़ मनघड़ंत बातें बता कर उन्हें आपस में लड़ाते रहते थे, और स्वयं हरदिल अज़ीज़ बने हुए थे। इसमत ने जहाँ उस लेख में अपने भाई की अनेक अच्छाइयाँ गिनवाई थीं, वहीं उनको घर में फूट डलवाने का दोषी भी ठहराया था।
वह लेख पढ़ कर मंटो की बीवी सफ़िया ने इसमत की अपने पति के आगे बहुत शिकायत की थी, और इसमत को ख़ूब बुरा भला कहा था, कि कहीं मरे हुए पर भी कोई यूँ कीचड़ उछालता है? और वह भी अपने मरहूम सगे भाई पर! लेकिन, विनोद, जानते हो मंटो का इस पर क्या reaction था? मंटो ने कहा, "सफ़िया, अगर मुझसे वादा करो कि इतनी ही ईमानदारी से तुम मेरे ऊपर एक आरटिकल लिख कर छपवा दोगी, तो क़सम ख़ुदा की मैं इसी वक़्त ख़ुदकुशी करके मरने को तैयार हूँ!"
राम लाल जी पर तुम्हारा भेजा लेख पढ़ कर मेरे दिल में हुक उठी थी कि काश मेरे मरने के बाद ऐसा ही एक लेख तुम मेरे ऊपर भी लिख डालो!
रोमानी

Thursday, July 20, 2017

अब न पिताजी लौटेंगे न अब्बा

- वीर विनोद छाबड़ा
एक ज़माना था जब हिंदू बच्चे अपने पिता को पिताजी कह कर पुकारते थे और मुस्लिम बच्चे अब्बा।
हमें याद है एक बच्चे के पिता को स्कूल बुलाया गया। बच्चे ने अपने पिता का परिचय टीचर से कराया - सर, यह मेरे फादर हैं।
टीचर ने बच्चे को डांट दिया - घर में पिताजी को फादर पुकारते हो क्या?
कुछ दिन हुए हमारे एक मित्र हमारा परिचय एक बड़े लेखक से कराया - यह....के लड़के हैं।
हमने कहा - जी, मैं ....का बेटा हूं।
हमारे मित्र थोड़ा लज्जित हुए।
हमारे समय में पिताजी, लालाजी, बोजी, बाबूजी, दार जी, अब्बा, अब्बू आदि संबोधन हुआ करते थे। लेकिन अब सब खत्म हो गया है। क्या हिंदू, क्या मुस्लिम और क्या सिख और क्या ईसाई । और क्या अमीर और क्या ग़रीब। शहर ही नहीं दूरस्थ ग्रामीण हिस्सों में मम्मी राज करती है। मां जाने कहां खो गयी। यहां वहां जहां तहां मम्मी ही मम्मी है। इसी तरह बाकी रिश्तों का भी अंग्रेज़ीकरण हो चुका है।
मम्मी बड़े गर्व से मिंटू और मिंटी को सिखा रही होती है कि जब कोई घर में आये तो चूहे को रैट, बिल्ली को कैट और शेर को लायन कहना। बेज़ान आईटम भी नहीं छूटे हैं। कुर्सी को चेयर और मेज़ को टेबुल बोलना सीखो बेटा मिंटू। 

Wednesday, July 19, 2017

और चिंपू खुद ही चला गया


-वीर विनोद छाबड़ा

ग्यारह साल का रिंकू पढ़ाई और खेलकूद में बेहद होशियार होने के साथ-साथ बेहद सुशील भी था। इसी वजह से स्कूल में उसकी बहुत तारीफ़ होती थी। कालोनी में तो सभी मम्मी-पापा अपने बच्चों को रिंकू की तरह नेक बनने की सलाह देते थे। बाल होशियार सुशील शान शैतान शर्त

मगर पिछले दो महीनों में सब कुछ बदल गया था। रिंकू को ज़बरदस्त खांसी-जुकाम बुखार ने घेर रखा था। इससे रिंकू की पढ़ाई चौपट तो हुई ही, वो बहुत चिड़़चिड़ा़ भी हो गया स्कूल वालों ने भी कह दिया कि जब तक रिंकू पूरी तरह से ठीक हो जाए उसे स्कूल भेजने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि उन्हें डर था कि उसके संपर्क में आकर दूसरे बच्चे बीमार हो सकते हैं। अब रिंकू पार्क में दूसरे बच्चों के साथ खेलने भी नहीं जाता था। अब उसका एक ही साथी था उसका प्यारा सा छोटा सा पेमेरियन कुत्ता- चिंपू। उसके मम्मी-पापा ने रिंकू के ईलाज में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। कई बड़े डाक्टरों को दिखा चुके थे। एलोपैथी के अलावा अच्छे होम्योपैथ डाक्टरों को भी दिखाया। बड़े-बड़े हकीम-वैद्यों से भी ईलाज कराया। उसे शायद किसी की नज़र लग थी। इसलिए बड़े-बुजु़गों के कहने पर बाबा-ओझा तक से नज़र उतरवायी। मगर कोई लाभ नहीं हुआ। बल्कि खांसी-जुकाम और भी तेज हो गया। बुखार से बदन भी कभी-कभी बुरी कांपने लगता था। फिर एक मित्र की सलाह पर एक नामी चेस्ट रोग विशेषज्ञ को दिखाया। उन्होंने रिंकू की भली-भांति जांच की। कई तरह के टेस्ट किए। फिर बोले- ‘‘घबराने की कोई बात नहीं। फेफड़ों में मामूली इंफेक्षन है। दवा लिख रहा हूं। आपका रिंकू जल्दी चंगा हो जाएगा।’’

और सचमुच चमत्कार हो गया। कुछ ही दिनों में रिंकू का खांसी-जुकाम बंद हो गया। बुखार भी चला गया। रिंकू अब स्कूल भी जाने लगा। पार्क में दूसरे बच्चे उससे खेलने भी लगे। सब कुछ पहले जैसा हो गया। मम्मी-पापा को रिंकू को ठीक करने वाले डाक्टर के रूप में मानों भगवान मिल गया हो। वो सब दुखद वक़्त को भूल ही गए थे कि एक दिन अचानक रिंकू को फिर से खांसी-जुकाम ने घेरा। थोड़ा-थोड़ा बुखार भी रहने लगा। 

मम्मी-पापा रिंकू को लेकर फिर उसी डाक्टर के पास गए। डाक्टर साहब ने ध्यान से रिंकू की जांच-परख की। कुछ नए टेस्ट कराये। छाती का एक्सरे भी लिया। रिपार्ट देखी और फिर थोड़ा गंभीर होकर बोले- ‘‘देखिए, बच्चे को अस्थमा एलर्जी है। पर घबराने की बात नहीं। इसका असरदार ईलाज है, दवाएं भी बाज़ार में है। कुछ दिन में फिर चंगा हो जाएगा। मगर आपको ध्यान रखना पड़ेगा कि रिंकू को खाने की ठंडी चीजों, जैसे आईस क्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स वगैरह, से दूर रखें। इसके अलावा कालीन, धूल, धूंआ, सीलन, बदबू, खुश्बू, साफ्ट ट्वायज़ वगैरह से भी एलर्जी होती है। पौधों और फूलों से भी एलर्जी होती देखी जाती है। रिंकू को इन सबसे पूरी तरह से बचा कर रखें।

रिंकू के मम्मी-पापा ने घर वापस आते ही कालीन बाहर कर दिया। सारे साफ्ट ट्वायज़ दूसरे बच्चों में बांट दिए। गमले पड़ोसियों के घर भिजवा दिए। जब तक रिंकू घर में रहता था पूजा-पाठ में धूप-अगरबत्ती का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पापा ने सिगरेट कभी नहीं पीने की क़सम खायी। फ्रिज से आईस क्रीम और कोल्ड ड्रिंक्स की छुट्टी कर दी गयी। रिंकू कुछ ही दिन में फिर पहले जैसा भला-चंगा हो गया। पांच-छह महीने गुज़र गए। अब सब पूरी तरह से भूल चुके थे कि रिंकू कभी बीमार था। दवा तो कबकी बंद हो चुकी थी।

तभी अचानक एक दिन सुबह-सुबह फिर रिंकू में खांसी-जुकाम और बुखार के लक्ष्ण दिखे। सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी। मम्मी-पापा ने बिना देरी किए रिंकू को उसी डाक्टर को दिखाने भागे। डाक्टर ने फिर से रिंकू को जांचा-परखा और बोले- ‘‘घबराने की बिलकुल ज़रूरत नहीं। अस्थमा एलर्जी ही है। दवा तो पुरानी वाली ही चलेगी। पर अब कई महीनों तक लगातार लेनी होगी। मम्मी-पापा को इत्मीनान हुआ। परंतु चिंता भी हुई। पापा बोले- ’’डाक्टर साहब, आपने जैसा कहा था वैसा ही किया। कालीन, साफ्ट ट्वायज़, पौधे आदि सभी घर से बाहर कर दिए है। धूप-बत्ती भी इस्तेमाल नहीं करते। हर तरह से ध्यान रखते हैं। मगर फिर भी एलर्जी हो गयी। ये बार-बार क्यों हो रही है?’’

डाक्टर साहब मुस्कुराते हैं- ‘‘मौसम बदलने से और ज्यादा ठंड और गर्मी से भी एलर्जी होती है। इधर सर्दी बढ़ रही है। हो सकता है इसी से हुई हो एलर्जी।’’ फिर सहसा कुछ सोचते हुए गंभीर हो कर बोले- ‘‘पालतु कुत्ते-बिल्ली भी एलर्जी की वजह होते हैं। अगर कोई है आपके घर में तो जितनी जल्दी हो सके उसे रिंकू से दूर कर दीजिए। बच्चे के स्वस्थ रहने और उज्जवल भविष्य के लिए यह ज़रूरी है।’’

रिंकू पर तो मानो कोई पहाड़ टूट पड़ा हो। घर आते ही वो फूट-फूट कर रोने लगा। उसे अपना पैमेरियन चिंपू तो जान से भी बढ़ कर प्यारा था। रात उसी के साथ बिस्तर पर सोता। सुबह स्कूल जाता तो चिंपू बस स्टाप तक उसे छोड़ने जाता। और जब वो स्कूल से लौटता तो चिंपू उसे हमेशा गेट पर ही इंतज़ार करते मिलता। पार्टी-समारोह आदि में पूरा परिवार कभी एक साथ नहीं जाता ताकि चिंपू को घर में अकेला नहीं रहना पड़े। कोई कोई घर पर ज़रूर रहता। अक्सर रिंकू ही चिंपू के साथ रहता। हां, जब कभी षहर से बाहर जाना होता तो फिर चिंपू को साथ ही ले जाते। मम्मी-पापा को भी चिंपू से बेहद लगाव था। चिंपू का रिंकू की तरह ही ख्याल रखते। घर का सदस्य था चिंपू। उसे अपने से दूर करने या घर से निकालने या किसी रिष्तेदार या मित्र को सौंप देने की कल्पना करते ही रिंकू के साथ-साथ उनको भी रोना गया। मगर रिंकू को स्वस्थ रखना भी तो ज़रूरी था। ये सोचते-सोचते घर में सन्नाटा खिंच गया, माहौल में उदासी छा गयी। सब मौन रहते हुए एक-दूसरे का मुंह ताकते रहते। मानों पूछते हों कि क्या किया जाए? मगर जवाब देने की स्थिति में कोई नहीं होता।