Saturday, January 7, 2017

मदन मोहन मालवीय - करोड़ों के भूखे रहते भोजन कैसे करूं?

- वीर विनोद छाबड़ा
मास्टर गंगा प्रसाद शर्मा की पोटली किस्से कहानियों से भरी रहती थी। उसी में की एक कथा मुझे भी याद है।
उन्होंने बताया था कि वाराणसी के एक बड़े धनाढ्य सेठ ने विशाल भोज का आयोजन किया। वाराणसी शहर के तमाम रईस और सम्मानित बुद्धिजीवी आमंत्रित किये गए।
पंडित मदन मोहन मालवीय जी बहुत बड़ी हस्ती थे। अतः सेठजी स्वयं न्यौता देने मालवीय जी के निवास पर पधारे। और उनसे भोज में शामिल होने की करबद्ध प्रार्थना की।
मालवीय जी बड़ी आत्मीयता से निमंत्रण पत्र स्वीकार कर लिया। परंतु भोज में उपस्थित होने में असमर्थता प्रकट की।
सेठ जी ने पुनः आग्रह किया।
लेकिन मालवीय जी ने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने कहा - मेरे देश में करोड़ों लोग आधा पेट खाकर गुज़ारा करते हैं। अनेक तो भूखे ही सो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में मेरा दिल नहीं मानता कि मैं ऐसे भोज समारोह में शामिल होऊं, जहां नाना प्रकार के व्यंजन हों। यों भी स्वादिष्ट भोजन मेरे गले नहीं उतरता। मैं सादा भोजन करता हूं और उतना ही करता हूं जितना शरीर के लिए आवश्यक होता है।

मालवीय जी के शब्दों ने सेठजी के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला। वो उनके समक्ष झुक गए। महोदय मैं आपका आशय समझ गया।
सेठ जी ने भोज समारोह रद्द कर दिया और उससे हुई बचत राशि निर्धनों के उत्थान में खर्च कर दी।
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नोट - आज का दौर बिलकुल फर्क है। जूता खरीदने पर पार्टी तो बनती है। जितने का जूता नहीं उससे ज्यादा तो पार्टी में खर्च होते हैं। वस्तुतः पार्टी के लिए बहाना चाहिए। ऐसे अवसर पर हमें भारत रत्न पं. मदन मोहन मालवीय जी की याद आती है। 
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